8:04 pm - Tuesday January 23, 2018

आतंकवाद से अधिक खतरनाक होती जातीय हिंसा

मनोज-यादव-संवाददाता

मनोज-यादव-संवाददाता

हिन्दुस्तान कई धर्मो कई जातियों का अनोखा समूह है। देश का संवैधानिक ढांचा भी ऐसा है की सबको बराबर ध्यान में रखकर इसका निर्माण किया गया है। जितने प्रांत है उस प्रांत में उससे अधिक बोलियाँ उससे अधिक जातियां और कई मजहब और सम्प्रदाय के लोग। अक्सर इतनी विभिन्नताओ के बाद कोई भारत की विशिष्ट पहचान नहीं है जो उसके एक मुकम्मल मुल्क का दर्जा दे सके बल्कि इसकी विशिष्टता तो इसकी विभिन्नता से और इसकी एकता से है। देश की आजादी के बाद से तमाम नए कानूनों के जरिये जातीय भेदभाव के खात्मे के लिए क़ानून बनाए और उसे लागू कराये गए लेकिन आज जब 21वी सदी में जब हम अधिक आधुनिक दौर में जी रहे है जातीय हिंसा की खबरे आती है तो मन उखड़ जाता है की जातीय बंधन आज भी इतनी मजबूत है की मानवता को शर्मशार कर देती है। सोमवार को पुणे के समीप एक गाँव में दलितों द्वारा शौर्य दिवस मनाने के विरोध में कुछ अराजकतत्यो की करतूतों का नतीजा यह रहा की एक युवक की मौत हो गई और औरंगाबाद पुणे सहित कई इलाको में प्रशासन को धारा 144 लगाना पड़ा जिससे अजर भी सामान्य जन को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। हम ऐसे दौर में जी रहे है जब आतंकवाद मुल्क के लिए अभिशाप बना हुआ है देश के जवान अपनी शहादत से देश की रक्षा के लिए तत्पर है वही देश में जातीय हिंसा की घटनाएं बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है। यह दहशतगर्दो से भी बड़ा विस्फोट है जिसकी जद में आने वाली पीढ़िया भी नुकसान उठा सकती है।blast-news भारतीय राजनीति की विद्रूपता के कारण भी जातीय हिंसा की आग को हवा मिल जाती है कुछ गैरसामाजिक और अराजकतत्व इसे गलत तरीके से पेश कर फैलाने की कोशिश करते है मामला तब और भी बिगड़ जाता है लेकिन अब देशवासियों को इस बात को भली भाति समझना होगा की उनका विकास ऐसे गैरहितकारी कार्यो से नहीं बल्कि उनके शिक्षा और समझ से विकसित होगा नहीं तो आजाद भारत का सपना देखने वाले अम्बेडकर और गांधी की विचारधारा मृतप्राय हो जायेगी और देश आपसी जातीय हिंसा में झुलस जाएगा।

 

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