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कभी कबाड़खाने में काम किया करता था यह बिहारी क्रिकेट कमेंटेटर, आज करोड़ों दिलों पर करता है राज….

20171119_114838मोतिहारी (आकाश कुमार सिंह) : मेरा जन्म 17 मई 1984 को भारत के बिहार प्रान्त के पूर्वी-चंपारण जिले के चिरैया प्रखंड अंतर्गत एक छोटे से गाँव भलुआही में हुआ था। मेरे पिता का नाम मोहम्मद अमीर और माता का नाम शाहजहाँ बेगम है। मैं अपने माता-पिता की 5 संतानों में दूसरे नंबर था। 4 भाई और 1 बहन। मां-पिता ने नाम मोहम्मद मेराज़ रखा। लेकिन जब मैंने होश संभाला तो अपने आप को देश की राजधानी नई दिल्ली के गोविंदपुरी मोहल्ले में पाया। मेरे पिता उस क्षेत्र के जाने माने उद्योगपति थे। दरअसल उनकी एक्सपोर्ट गारमेंट्स की 2 फैक्टरियां थीं,जिनमें लगभग 500 कारीगर काम करते थे। इसलिए मैंने जीवन में सिर्फ सुख ही सुख देखे थे,दुःख क्या होता है इसका एहसास न था। जो फरमाइश करता,झट से पूरी कर दी जाती।
मेरे पिता जी को लोग मास्टर जी कहते थे,क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक टेलर मास्टर से की थी,परंतु अपने संघर्ष और लगनशीलता की वजह से उन्होंने सफलता पाई। मैं अपने पिता को बहुत प्यारा था,इसलिए वो कभी कभी मुझे भी अपनी फैक्ट्री में घुमाने ले जाते। फैक्ट्री के कारीगरों ने कहा कि मास्टर जी का बेटा है तो इसके नाम लिटिल मास्टर होना चाहिए, यानी छोटा मास्टर जी। बस वहीं से मेरा नाम लिटिल हो गया।
कहते हैं न कि सुख उस पंछी की भाँति है,जो कभी भी उड़ सकता है। हमारे साथ भी यही हुआ। पिताजी को फैक्ट्री में घाटा हो गया,ये कैसे हुआ आजतक मुझे पता न चल सका। कर्ज की वजह से दोनों फैक्ट्रीयां,मकान तक बिक गया। राजा से रंक बन गए। अपने अच्छे दिनों में पिताजी ने कभी भी गांव में वापस जाने के बारे में सोचा नहीं था,इसलिए कभी यहाँ कुछ अर्जित नहीं किया। लेकिन होनी को यही मंजूर था। मजबूरन पिता जी को गाँव वापस आने पर मजबूर होना पड़ा। पूरे परिवार के साथ 1992 में पहली बार बिहार की धरती पर मैंने कदम रखा। क्योंकि मात्र 8 साल मेरी उम्र थी,इसलिए ज़िन्दगी के थपेड़ों से अनजान था। मुझे तो पता ही नहीं था पिताजी मजबूरी में हमें गाँव वापस ला रहे थे। लेकिन मैं तो गाँव का नाम सुनकर ही रोमांचित था,की गाँव होता कैसा है।20171119_114838
मुझे एक घटना आज भी जब भी याद आती है,मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता। जैसे ही हम पटना से ग्रामीण इलाकों में आने लगे,बाँस हमारे लिए 8वें अजूबे की तरह था। क्योंकि हम उसे गन्ना समझ रहे थे। खैर ये भ्रम भी जल्द ही दूर हो गया।

समय पंख लगाकर उड़ने लगा। पिताजी ने परिवार की खातिर दिल्ली में वापस आकर नौकरी करनी शुरू कर दी, और इधर हम सभी भाई बहन गँवई माहौल में घुलने मिलने लगे। गांव के ही सरकारी विद्यालय में मैंने पढ़ाई शुरू की। शुरू शुरू में भाषा की बहुत दिक्कत थी,क्योंकि मैं भोजपुरी मैं समझ नहीं पाता था और शिक्षकगण ज्यादातर भोजपुरी का ही प्रयोग करते थे। इस वजह से कई बार बच्चों ने भी हमारा उपहास उड़ाया।
खैर धीरे धीरे भाषा समझ आने लगी और मैं मन लगाकर पढ़ने लगा। शहर की चकाचौंध कहीं पीछे छूट गई और गांव की सादगी अब ज़िन्दगी का हिस्सा बन गई। समय ने बहुत कुछ सीखा दिया था। अब सुख और दुःख का अंतर समझ मे आनेलगा था। खैर समय बीतता गया और 2001 में मैट्रिक और 2003 में इंटरमीडिएट कर लिया। लेकिन इसके बाद ही ज़िन्दगी का असली संघर्ष शुरू हुआ
मोतिहारी के लक्ष्मीनारायण दुबे कॉलेज में नामांकन कराने के बाद पिताजी की अचानक तबियत खराब हो गई। वो गांव आ गए और अक्सर बीमार रहने लगे। बड़े भाई परिवार की जिम्मेदारी उठाने दिल्ली आए,परंतु उनकी कोई खबर न मिली। परिवार पर दोहरी मुसीबत आन पड़ी। घर का बड़ा बेटा लापता हो गया और साथ ही खाने के लाले पड़ने लगे। ऐसी स्थिति में घर-परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उठाना मेरी मजबूरी बन गई। एक तो पिता जी की दवाओं का खर्च,और ऊपर से परिवार का खर्च चलाना,वास्तव में ज़िन्दगी का सबसे बड़ा इम्तिहान था। क्योंकि कोई काम तो जानता नहीं था,अतः गाँव के ही एक व्यक्ति की सीतामढ़ी जिले बैरगनिया कस्बे में कबाड़ की दुकान थी। उसने मुझे कहा कि हमारे यहां आ जाओ,सिर्फ लिखना पढ़ना है। यानी हिसाब किताब रखना है। 1200 रुपए महीने की पगार तय हुई।
क्योंकि इतने पैसे से कुछ होना नहीं था,इसलिए कुछ समय यहां बिताने के बाद 2004 के मई में मैं ज्यादा पैसे कमाने के उद्देश्य से दिल्ली चला आया। यहां भी वही समस्या थी,कोई काम तो जनता नहीं था,इसलिए दिल्ली के तुगलकाबाद में एक्सपोर्ट गारमेंट की फैक्ट्री में हेल्पर की नौकरी बड़ी मुश्किल से मिली। मैनेजर ने मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हुए 12 घंटे की ड्यूटी के सिर्फ 2000 पगार रखी। मजबूरी थी,इसलिए मानना पड़ा।
जब मैं फैक्ट्री के अंदर पहली बार गया तो मुझे दुनिया सबसे बड़ा दुःख हुआ। कभी मेरे पिताजी एक्सपोर्ट गारमेंट्स की 2 फैक्टरियों के मालिक हुआ करते थे,आज समय की ऐसी मार पड़ी की उसी फैक्ट्री में उनका बेटा एक मामूली मजदूर है। खैर काम करना शुरू किया।20171119_114838
क्योंकि महीने के 2000 रुपयों में अपना गुजारा तो हो नही रहा था तो घर कहाँ से पैसे भेजता? अतः मैंने उसी फैक्ट्री में कुछ कारीगरों में अपनी अच्छी इमेज बनाई। वो मुझे छुट्टी होने के समय में अंतिम 10 मिनट का जो समय मिलता,उसमें मशीन के बारे में और सिलाई के बारे में बताते। धीरे धीरे मैंने उनलोगों की मदद से सिलाई के कुछ गुर सिख लिए और वहां काम छोड़कर ओखला इंडस्ट्रियल एरिया में दूसरी फैक्ट्री में सिलाई का काम करने लगा। परिणाम स्वरूप आमदनी बढ़ने लगी। अब घर भी पैसे भेजने लगा।
इसी बीच भाई को भी मैंने खोज निकाला। एक फैक्ट्री में बंधुआ मजदूर की तरह उनलोगों को रखा जा रहा था,दिल्ली के सरिता विहार इलाके में थी। पुलिस के हस्तक्षेप से उनकी आज़ादी हुई।
कालांतर में उनका विवाह हो गया और कुछ समय बाद बहन का भी विवाह हो गया।
सब कुछ अब धीरे धीरे ठीक होने लगा था। घर मे अब समृद्धि आने लगी थी।
2007 में एक विवाह समारोह में मैंने एक लड़की को देखा। पहली बार दिल में किसी को देखकर कुछ अजीब सा अहसास हुआ। शायद उसे प्यार कहते हैं। क्योंकि लड़की स्वजातीय थी,इसलिए मैने अपने एक मददगार से लड़की वालों तक बात पहुँचवाई अपनी शादी की। जल्द ही लड़की वाले भी सहमत हो गए। दरअसल ये सब लड़की की रजामंदी से हुआ था,यानी उसे भी मैं पसंद था। मेरे दिल से एक बोझ उतर गया कि चलो एकतरफा मोहब्बत नहीं थी मेरी। शादी के दिन से एक महीने पूर्व बीमारी के कारण पिताजी चल बसे। अचानक दुःखद घटना घट गई,जिसके बावजूद कुछ बुद्धिजीवियों के सुझाव स विवाह अपनी निर्धारित तिथि पर ही हुआऔर वो आज की डेट में 1 लड़का और 1लड़की का पिता हूँ।
बेटे का नाम रेहान फ़ज़ल।blast-news
उसका जन्म 25 नवंबर 2013 को है।
विवाह के पश्चात 2008 में मैंने ह्युंडई फोर व्हीलर कंपनी में सिलाई छोड़कर जॉब कर ली। बॉडी शॉप एडवाइजर का काम था। सब ठीक चल रहा था,अचानक 2010 में जब मैं छुट्टियों में घर आया था,मेरी तबियत खराब हो गई। पेट मे बहुत तेज़ दर्द था। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा कि आपकी दोनों किडनी में स्टोन है। दवा के साथ रेस्ट जरूरी है। अतः आपको घर पे रहकर ये दवाएं लेनी होंगी। सोचा कि चलो कुछ दिनों की बात है,फिर सब ठीक हो जाएगा।
गांवों के हालात तो आप जानते ही हैं। अगर कोई तरक्की करे तो कुछ लोगों के पेट मे मरोड़ उठती है। वही हुआ भी। मेरी तबियत खराब होने के पश्चात कुछ लोगों ने मेरे भाइयों के कान फूंके और भाई भाई में बंटवारा करवा दिया।
मैं जहां से चला था वहीं पहुंच गया था। पहले भी परिवार के लिए संघर्ष और अब भी परिवार के लिए संघर्ष।
खैर, मेरे एक दोस्त मुनेश ने मुझे कोचिंग में पढ़ाने की सलाह दी। मैंने भी सोचा कि बेकार से बेगार भला। मैंने उनकी कोचिंग में पढ़ाना शुरू कर दिया। वहां का माहौल बड़ा ही पॉजिटिव था। प्रत्येक शिक्षक जीवन मे तरक्की की ही बातें किया करते थे,जिससे मुझे भी हौसला मिलता था। सभी शिक्षकों से बहुत सहयोग मिला और सभी मेरे काफी अच्छे दोस्त बन गए। उनमें एक शिक्षक विजय जी ने मुझे आज के मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भमिका निभाई,जिसकी चर्चा मैं आगे करूंगा।
उसी वर्ष मैं पिता बन गया। 23 सितंबर 2010 को मेरी छोटी सी बगिया में सिमरन नाम का फूल खिला। प्रथम संतान पाकर हम पति-पत्नी बहुत प्रसन्न थे। घर मे हमेशा एक किलकारी गूंजती रहती,जिससे ज़िन्दगी के संघर्ष का आनंद बढ़ गय मैं अपने विद्यार्थी जीवन मे एक अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी रह चुका था। अपने खेल से अपने क्षेत्र में मैंने अच्छी ख्याति अर्जित की थी। मुझे क्रिकेट कॉमेंट्री करने का भी शुरू से ही शौक रहा था। जहां भी किसी क्रिकेट टूर्नामेंट में जाता,अपनी बल्लेबाज़ी की बारी आने से पहले कॉमेंट्री कर लिया करता था। अमूमन मैं टीम में 5 या 6 नम्बर पर बल्लेबाजी करता था,अतः मेरे पास पर्याप्त समय होता था कि मैं कुछ ओवर कॉमेंट्री कर सकूं। दरअसल कॉमेंट्री मैं शौकिया तौर पे ही करता था। इसमें कोई कैरियर बनाना है,इस बारे में कभी सोचा भी नहीं था। क्योंकि विद्यार्थी जीवन में मैं गाँव में रहा हूँ,जहां बिजली न के बराबर रहती थी,और टीवी देखना एवरेस्ट चढ़ जाने के बराबर था। क्योंकि साफ कुछ आता नहीं था। आपने भी अपने समय में बहुत एंटीना घुमाया होगा। इस वजह से रेडियो ज्यादा लोकप्रिय था और लोकप्रिय थी ऑल इंडिया रेडियो की क्रिकेट कॉमेंट्री! हमलोग विनित गर्ग,सुशील दोषी, अमरेंद्र सिंह,इफ्तेखार अहमद,सुनील वैद्य,संजय बैनर्जी,कुलविंदर सिंह कंग,सुरेश सरैया इत्यादि को सुनते हुए बड़े हुए थे। अतः कॉमेंट्री के दौरान इनके द्वारा कही गई बातों को फॉलो करता था।इसलिए कॉमेंट्री में पकड़ शुरू से ही रही मेरी।
अब एकबार फिर से मैं गाँव मे रहने लगा था। क्योंकि कोचिंग-ट्यूशन के बाद काफी समय बच जाता था,इसलिए अंदर का खेलप्रेमी फिर से जागने लगा। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां भी कोई टूर्नामेंट आयोजित होता,मुझे बुलवा लिया जाता कॉमेंट्री के लिए। पहले पार्ट टाइम कॉमेंट्री करता था,अब फुल टाइम हो गई थी। पहले शौकिया ही करता था,अब कॉमेंट्री के पैसे भी मिलने लगे। ऐसे ही एक बार मैं पूर्वी-चंपारण जिले के चकिया गांधी मैदान में कॉमेंट्री के लिए पहुँचा।इतना बड़ा और भव्य टूर्नामेंट मैंने पहली बार देखा था। यही टूर्नामेंट मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यहाँ के लोग मेरी कॉमेंट्री के कायल हो गए। यहीं मुजफ्फरपुर टीवी चैनल के लिए फुटबॉल कॉमेंट्री कर चुके कॉमेंटेटर जोहा अफ़ज़ल से मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया कि आप ऑल इंडिया रेडियो जॉइन कीजिए। रेडियो के लिए मेरे मन में अंकुर वहीं फूटा। फिर उसके बाद 2013 में मोतिहारी के गांधी मैदान में सी.आर.पी.एफ. की 153वीं बटालियन द्वारा आयोजित टूर्नामेंट में मुझे उद्घाटन मैच में बुलाया गया कॉमेंट्री के लिए। कॉमेंट्री के बाद किसी ने मुझे दुबारा आने के लिए नहीं कहा। मुझे लगा शायद इन लोगों को मेरी कॉमेंट्री पसंद नहीं आई। परंतु अगले दिन मेरे पास 12 बजे फोन आता है सी.आर.पी.एफ के डिप्टी कमांडेंट का की आप आज क्यों नहीं आए,आपको सुनने के लिए आज हमारे बॉस यानी कमांडेंट साहब स्पेशल समय निकाल कर आए हैं। ये शब्द निश्चित रूप से मेरा हौसला बढ़ाने वाले थे। मैं गया और आखिरकार फाइनल में जिलापदधिकारी द्वारा सम्मानित हुआ। ये सब एक सपने जैसा था। मैंने सोच लिया था कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखना है।
उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो की कॉमेंट्री विलुप्त हो रही थी। किसी श्रृंखला की कॉमेंट्री होती,तो किसी की नहीं। ऐसे में यहाँ प्रयास करना समय बर्बाद करना लगा। फिर मैंने सोचा कि क्यों न नेपाली एफएम चैनल पर कॉमेंट्री प्रसारित की जाए। क्योंकि हमारा जिला नेपाल से सटा हुआ है। नेपाल के सीमावर्ती जिलों में नेपाली एफएम काफी लोकप्रिय थे। बस फिर क्या था, मन में ठान लिया कि यहीं कॉमेंट्री प्रसारित करनी है। परंतु जब ये प्रस्ताव एफएम वालों को बताया तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। क्योंकि नेपाल में फुटबॉल ज्यादा लोकप्रिय था,इसलिए एफएम वाले क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। इस स्थिति में हताश और निराशा के सागर में मैं जा डूबा। ऐसी स्थिति में मेरे दोस्त और कोचिंग के साथी शिक्षक विजय कुमार जी ने मुझे हौसला दिया। उन्होंने कई मिसालें दीं। मुझे प्रोतसाहित किया। कई सारी वास्तविक घटनाएं बताईं,जिनमें लोगों ने लंबे संघर्ष और बुलंद इरादों से अपने उद्देश्य में कामयाबी पाई। मैंने फिर से हिम्मत की और फिर से नेपाल पहुंचा। मैंने एफएम के मालिक से कहा कि आप सिर्फ 2 मैच करके देखो,अगर आपके एफएम की टीआरपी न बढ़ गई तो कहिएगा। आखिरकार कई दिनों की भागदौड़ के बाद 2013 के आईपीएल में कॉमेंट्री प्रसारित करने पर विचार हुआ। इसके लिए नेपाल संचार निगम से स्वीकृति के अलावा जरूरी कागजी खानापूर्ति के बाद हमलोग तैयार थे कॉमेंट्री के लिए।लेकिन किन्हीं कारणोंवश पहले 2 मैचों की कॉमेंट्री न हो सकी।
आखिरकार 5 अप्रैल 2013 का वो दिन मेरी ज़िंदगी एक बहुत ही अहम दिन साबित होनेवाला था,क्योंकि इसी दिन रेडियो पर पहली बार मेरी आवाज़ गूँजनेवाली थी। दिल बल्लियों उछल रहा था रोमांच के मारे। आखिर वो घड़ी भी आ पड़ी जब स्टूडियो में मैं अब कॉमेंट्री को तैयार ही था। पूरे क्षेत्र में इस प्रसारण को लेकर एक अलग ही माहौल था।पूरा नेपाल का तराई इलाका अपने रेडियो सेट के पास कान लगाकर चिपक गया था। क्योंकि एक इतिहास कायम होनेवाला था। ये सब सोचकर मैं नर्वस हो गया। ए. सी. में भी मैं पसीने से तरबतर था। मेरी इस स्थिति को मैनेजर ने देख लिया। उन्होनें संयम से काम लिया। वो हमारे केबिन में आए और कहा कि रेडियो में कुछ टेक्निकल फॉल्ट हो गया है,जिसकी वजह से हमें रेंज घटानी पड़ रही है। ये प्रसारण फिलहाल हमारे शहर तक ही रहेगा। क्योंकि नेपाल में क्रिकेट प्रेमी न के बराबर हैं,इसलिए मुश्किल से 50 रेडियो ही ट्यून हुए होंगे।
ये सुनकर मुझे निराशा तो हुई पर दिल का डर भी कम हो गया। फिर क्या था आईपीएल के 6थे सीजन के 3रे मैच में हैदराबाद सनराइजर्स और पुणे वारियर्स की टीमें हैदराबाद के राजीव गाँधी इंटरनेशनल स्टेडियम में टकराईं,और उस टकराहट की पहली बॉल की गूंज जो मेरे मुख से नेपाली एफएम रेडियो के इतिहास में पहली बार गूंजी,वो आजतक बदस्तूर जारी है।
आज नेपाल के तराई एवं बिहार के सीमावर्ती पूर्वी चंपारण,पश्चिमी चंपारण,सीतामढ़ी,शिवहर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर,गोपालगंज,सिवान, छपरा इत्यादि जिलों में 1 करोड़ से अधिक लोगों तक क्रिकेट के तीनों प्रारूपों टी-20,एकदिवसीय एवं टेस्ट की कॉमेंट्री पहुंचाने का श्रेय मुझे है। हमारी कॉमेंट्री का आलम अब यह है कि नेपाली लोग भी अब क्रिकेट और कॉमेंट्री के मुरीद हो चुके हैं। कभी सोचा नहीं था ,इतनी सफलता और लोगों का प्यार मिला। परंतु दिल में सिर्फ एक ही चीज की टीस रहती। वो है भारतिय मीडिया का इस कॉमेंट्री को स्थान न देना। यही काम अगर मैंने ऑल इंडिया रेडियो से किया होता तो शायद आज मेरी गिनती क्रिकेट कॉमेंटटरों के लीजेंड में होती।
फिर भी जीवन से कोई शिकवा नहीं,शिकायत नही। इस कॉमेंट्री ने कई अवार्ड दिलवाए,समाज में मान-सम्मान दिलवाया, यही काफी है। लोग देखते हैं,तो कहते हैं,वो देखो लिटिल गुरु जा रहे हैं।
ये चार शब्द काफी हैं। अब ये न पूछिएगा की मोहम्मद मेराज़ से आप लिटिल गुरु कैसे हो गए आप। तो छद्म नाम लिटिल था ही,जो आप पहले पढ़ चुके हैं। और गुरु मैं पहले था ही,यानी शिक्षक!
इससे ही लिटिल गुरु बना।

अच्छा, चलता हूँ अब,
दुआओं में याद रखना।
लव यू क्रिकेट,लव यू कॉमेंट्री, लव यू लिस्नर्स एंड ऑल ऑफ यु।

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