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क्योंकि काला होना अपराध है!

3-copyनई दिल्ली(संदीप)। हाल ही में वैश्विक सौंदर्य प्रतियोगिता का समापन हुआ जिसकी एक तस्वीर सोशल मीडिया के जरिए जन-जन तक वायरल हो रही है जिसमें सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग ले रही तीन स्त्रियां हैं. चूँकि प्रतियोगिता वैश्विक है इसलिये जाहिर है कि वो अपने देश की सबसे सुंदर स्त्री होंगी. उनमें दो का रंग गोरा है जबकि एक जो केन्या की प्रतिभागी है उसका रंग काला. केन्या के प्रतिभागी का नाम मैगलीन जेरुतो है. बस यहीं से समस्या शुरू होती है.तस्वीर के साथ जारी कैप्शन में मैगलीन को चिन्हित करते हुए लिखा है कि ‘ये यहां क्या कर रही है’? मतलब सुंदरता की प्रतियोगिता में काले लोगों का क्या काम?और लोग इस पर हँस रहे हैं. इसके पहले ट्विटर पर नवाजुद्दीन सिद्दकी को ‘रंग’ को लेकर ट्रोल किया जा चुका है. और यह कोई अकेली घटना नहीं है.गोरेपन को लेकर हम भारतीय बदतमीजी की हद तक ओब्सेस्ड हैं. जर्नालिज्म का विद्यार्थी होने के नाते मैं इसका जो कारण समझ पा रहा हूँ, आपसे भी साझा कर रहा हूँ.
यह किसी विडम्बना से कम नहीं कि विषुवत रेखा के निकट के एक देश में जहाँ स्वाभाविक रूप से चमड़ी का रंग अश्वेत ही होगा वहाँ गोरा होना सौंदर्य का मानक बन गया है। यही नहीं गोरेपन का सौंदर्यबोध इतना हावी हो गया है कि यह ‘अपने से अधिक अश्वेत’ लोगों के साथ रंगभेद तक को प्रोत्साहित करने लगा है। सामान्य तौर पर एक आम भारतीय के मन में गोरापन एक ‘आदर्श रूप’ का मानक बन चुका है। चाहे विवाह के लिए गोरा/गोरी वर/वधू की अनिवार्यता की बात हो या विदेशी पर्यटकों के विज्ञापनों में सिर्फ़ गोरी चमड़ी वालों को दिखाना हो या बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला जैसे कहावत हों ; इन सब के मूल में गोरेपन का वर्चस्व है जो जाने अनजाने हमारे व्यवहार के अंग बन चुके हैं। अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ? क्या इसका सम्बन्ध सिर्फ़ औपनिवेशिक चरित्र से है या कुछ अन्य कारक भी इससे संबंधित रहे हैं?क्या ऐसा हमेशा से रहा है?
दरअसल ऐसा हमेशा से नहीं रहा है. वैसे भी इसका संबंध भौगोलिक विशेषता से है इसलिए यूरोप का भूगोल उसे गोरा रंग देता है औ भारत का काला. पौराणिक आख्यानों में अक्सर ‘श्याम वर्ण’ की श्रेष्ठता को व्याख्यायित किया गया है। राम,कृष्ण जैसे पात्र तो श्याम वर्ण के हैं ही कालिदास की रचनाओं में भी इसे सुंदरता का पर्याय माना गया है। वात्स्यायन ने तो यहाँ तक कहा है कि सुंदरता काले रंग में ही निवास करती है। ऐसे अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं जब गोरापन सौंदर्य का पर्याय नहीं बना था, किंतु भारत में विदेशी शासन के आगमान के साथ यह प्रवृति बदली और अंग्रेज़ों की श्रेष्ठता के साथ गोरे रंग की श्रेष्ठता भी स्थापित होती चली गयी।
यह प्रवृति अनायास ही विकसित नहीं हुई है. ‘रुड्यार्ड किप्लिंग’ जैसे विद्वानों ने ‘ व्हाइट मैन बर्डेन थियरी’ के माध्यम से औपनिवेशिक शासन के औचित्य को सिद्ध करना चाहा और कहा कि गोरे यहाँ कालों को सभ्य बनाने आए हैं। यही बात अन्य काले रंग वाले लोगों के देशों में भी कही गयी। फिर आर्य नस्ल का सिद्धांत देकर भारत में ही कम अश्वेत और अधिक अश्वेत के बीच विभाजन कर दिया गया। चूँकि अंग्रेज़ों ने भारत में लम्बे समय तक शासन किया इसलिए गोरा रंग श्रेष्ठता का प्रतीक बन गया। फिर वैश्विक स्तर पर भी गोरे प्रभुत्वशाली बने रहे इसलिए उनके महान होने के दावे को ख़ारिज नहीं किया जा सका। यही कारण है कि गोरापन गोरे कहे जाने वाले देश के कालों के लिए भी भेदभाव का सबब बना रहा।2
गांधी , मंडेला, लुथली,मार्टिन लूथर जैसे लोगों ने इसके ख़िलाफ़ लम्बी लड़ाई लड़ी किंतु एक विचार के रूप में गोरेपन का वर्चस्व भले ही समाप्त हो गया हो लेकिन व्यवहार के रूप में यह अभी भी मज़बूती से बना हुआ है। इसको मज़बूत करने में मानव शरीर के वस्तुकरण की प्रक्रिया के तेज़ होने ने भी योगदान दिया है। बाजारवाद का ज्यों ज्यों विकास होता गया देह विशेषकर स्त्री देह का वस्तुकरण अधिक तेज होता गया।फिर एक उत्पाद की भांति ‘सुंदर’ दिखने की चाह में ब्यूटी पार्लर, सौंदर्य प्रसाधान इत्यादि का उपयोग बढ़ने लगा और इस ‘सुंदर देह’ की सुंदर प्रस्तुति के लिए गोरापन एक मानक बन गया ।चूँकि जो बाजारवाद हमारे यहाँ आया वो पश्चिम से ही आयी थी इसलिए उसके मूल में गोरेपन की उच्च्ता शामिल थी। फिर बाज़ार ने न केवल उत्पाद के माध्यम से गोरेपन को बढ़ावा दिया बल्कि एक ऐसी मानसिकता को भी मज़बूत कर दिया कि गोरा होना ही अच्छा होना है। आज यह एक यथार्थ हो गया है जिससे छुटकारा पाना ही होगा।
इस मानक को तोड़कर ही हम अपनी मर्जी को अधिक मुक्त कर सकते हैं। रंग को लेकर स्थापित रूढ़िवाद के साथ बाजार के शोषण को भी अनावृत्त करना होगा क्योंकि ये दोनों हमारी मर्जी को गहरे तौर पर प्रभावित करते हैं। यह इसलिए भी अनिवार्य है क्योंकि इसके बिना भारतीयता का स्वाभिमान अधूरा है। अपनी चमड़ी को निम्न समझने से अधिक दासताबोध और क्या हो सकता है।

(लेखक जर्नालिज्म विद्यार्थी)

 

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