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दूसरे धर्म में शादी करने से महिला का मजहब बदल जाएगा, ऐसा कोई कानून नहीं: SC

vनई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दूसरे मजहब में शादी करने वाली महिलाओं को लेकर एक अहम बयान दिया। एक पारसी महिला के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की कान्स्टीट्यूशन बेंच ने कहा- अगर कोई महिला दूसरे मजहब के शख्स से शादी करती है तो उसका धर्म नहीं बदल जाएगा। इस तरह का कोई कानून हमारे देश में नहीं है। चीफ जस्टिस की अगुआई वाली पांच जजों की कान्स्टीट्यूशन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।

क्या है मामला?

– बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस एके. सीकरी, जस्टिस एएम. खानविलकर, जस्टिस डीवाय. चंद्रचूढ़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं।
– गुलरुख एम. गुप्ता नाम की महिला ने एक हिंदू शख्स से शादी की। वो अपने पैरेंट्स के अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहती हैं। लेकिन, वलसाड पारसी बोर्ड इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। मामले की सुनवाई 2010 में गुजरात हाईकोर्ट में हुई थी। तब हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर पारसी महिला किसी हिंदू से शादी करती है तो उसका मजहब वही हो जाएगा जो उससे शादी करने वाले शख्स का है।
– इस लिहाज से पारसी महिला अंतिम संस्कार के लिए पारसियों के ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ में जाने का हक खो देगी। महिला ने कहा कि अगर कोई पारसी पुरुष दूसरे मजहब की महिला से शादी करता है तो उसके पारसी हक नहीं छीने जाते, फिर पारसी महिला के साथ ये क्यों किया जाता है।blast-news

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

– सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर कहा- ऐसा कोई कानून नहीं जिसके तहत एक मजहब की महिला अगर दूसरे मजहब के शख्स से शादी करती है तो उसका पहला मजहब छूट जाएगा।
– बेंच ने आगे कहा- हमारे यहां स्पेशल मैरिज एक्ट है। और ये इजाजत देता है कि दो अलग मजहबों के लोग शादी के बाद भी अपनी-अपनी धार्मिक पहचान कायम रख सकते हैं।

महिला की वकील ने क्या दलील दी?

– महिला की तरफ से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंग ने कॉमन लॉ डॉक्ट्रिन का हवाला देते हुए कहा कि इसके मुताबिक तो गैर मजहब में शादी करने के बाद महिला का धर्म अपने आप बदल जाता है।
– इंदिरा ने कहा- क्या हम कॉमन लॉ डॉक्ट्रिन को भारत में लागू कर सकते हैं जबकि ये उसी देश में नहीं है जहां से इसकी शुरुआत हुई? उन्होंने इसकी पूरी तरह जांच की मांग भी की। कहा- मेरे हिसाब से तो ऐसी कोई प्रथा नहीं है। अगर है भी तो ये संविधान की व्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाती है।

महिला को ये हक क्यों नहीं?

– इस पर बेंच ने कहा- एक शख्स अगर दूसरे मजहब में शादी करता है तो समाज उसे अपना मजहब मानते रहने की इजाजत देता है। फिर क्यों, दूसरे मजहब में शादी करने वाली महिला को अपनी पहली धार्मिक पहचान रखने की इजाजत नहीं है। एक महिला को इस मामले में कैसे रोका जा सकता है?
– बेंच ने साफ तौर पर कहा कि ये एक महिला का हक है कि वो ये तय करे कि वो किस मजहब को मानना चाहती है। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी। इस दिन वलसाड बोर्ड ट्रस्ट का पक्ष भी सुना जाएगा। 9 अक्टूबर को ही इस मामले को कान्स्टीट्यूशन बेंच को सौंपा गया था।

 

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