12:23 am - Saturday April 21, 2018

प्राइम टाइम इंट्रो : देश का किसान और जवान है परेशान

किसानों को क्यों लगता है कि उनके मुद्दे पर टीवी पर चर्चा होगी तो समाधान हो जाएगा, क्या कभी समाधान हुआ है.

रवीश कुमार की कलम से

मुद्दों की मारामारी में आगरा से एक किसान का फोन आता है कि अक्तूबर के महीने में आलू के जो बीज बोए थे उनका उत्पादन काफी कम हुआ है. वे पहले से बर्बादी का सामना कर रहे थे मगर इस बार मार और पड़ गई है. टीवी का जो चरित्र हो गया है और दर्शकों की पसंद जिस तरह से बन गई है, उसके बीच आलू किसान की हालत पर आप चर्चा करेंगे तो किसकी दिलचस्पी होगी. क्या ऐसा हो सकता है कि अफरीदी और आलू को जोड़ कर चर्चा की जाए ताकि बहुत सारे प्रवक्ता ऑफिस के बाहर लाइन लगाकर खड़े हो जाएं कि हम भी बोलेंगे हम भी बोलेंगे. इस समस्या का समाधान आखिर कब निकलेगा. किसानो को क्यों लगता है कि उनके मुद्दे पर टीवी पर चर्चा होगी तो समाधान हो जाएगा, क्या कभी समाधान हुआ है. 2019 के लिए झूठे वादों की फेहरिस्त हर दल के नेता बना रहे थे. जो किसान आज रो रहे हैं वही सबसे पहले उन वादों के झांसे में आएंगे. बहरहाल किसान ने जो समझाया बताई है वो इस तरह से है.

एक एकड़ में चालीस पैकेट आलू का बीज लगता है. आम तौर पर चालीस पैकेट से 250 पैकेट आलू निकलता है मगर इस बार तो 80 पैकेट भी नहीं निकला है. यूपी सरकार सारे ख़र्चे जोड़ कर 650 रुपये प्रति क्विंटल आलू देने की बात करती है मगर सारा आलू कहां खरीद पाती है. आलू किसान ने बताया कि नोटबंदी के समय से ही वे बर्बादी झेल रहे हैं. अब अगर आलू थोक मंडी में 30 रुपये किलो बिकेगा तभी उनकी लागत निकलेगी. इसके लिए 1500 रुपये प्रति क्विंटल का भाव चाहिए. हमने उनकी बात बता दी. एक किसान की समस्या है या पश्चिम यूपी के सभी आलू किसानो की समस्या है बहुत मुश्किल है तय कर पाना मगर किसान की बात पर भरोसा तो करूंगा कि ज़्यादातर आलू उत्पादकों का यही हाल है.


गन्ना किसानों ने चीनी मिलों को गन्ना तो दे दिया मगर पैसा नहीं मिला है. केंदीय खाद्य व सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री सी आर चौधरी ने संसद में बयान दिया है कि 31 जनवरी 2018 तक देश भर में चीनी मिलों पर 14000 करोड़ से अधिक का बकाया है. इतना पैसा किसानों के पास नहीं गया है. यूपी के गन्ना किसानों पर 8000 करोड़ से अधिक का बकाया है. जबकि यूपी सरकार ने वादा किया था कि 14 दिनों के अंदर पेमेंट होगा. कई जगह से किसान बताते हैं कि जनवरी के बाद से पैसे नहीं मिल रहे हैं. सोचिए इतना पैसा हाथ में नहीं होने से किसानों की क्या हालत होती होगी. ये तो उनकी महानता है कि वे फिर भी टीवी देख रहे हैं जिसमें उनके मुद्दे नहीं हैं. किसान बीज लेता है खाद लेता है, टाइम पर नहीं देगा तो ब्याज देना पड़ेगा.
राजस्थान से किसान ने लिखा है कि सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4000 रुपये प्रति क्विंटल है, मगर बाज़ार में कही 3500 से 3600 रुपये से ज्यादा का भाव नहीं है. चना का समर्थन मूल्य है 4400 रुपये प्रति क्विंटल  और बाज़ार भाव है 3600 रुपये प्रति क्विंटल. इतना हंगामा होने के बाद भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की ये हकीकत है. जब तक किसान प्रदर्शन नहीं करते तब तक सरकार भी चुस्त नहीं होती है. इन सबके बीच अच्छी ख़बर ये है कि भारत में पेट्रोल की राजनीतिक ख़त्म हो गई है. होती तो 75 से 85 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल का दाम होने पर मिट्टी तेल डालकर पुतले फूंके जा रहे होते.

महाराष्ट्र के ही 16 से ज़्यादा शहरों में पेट्रोल का भाव 80 रुपये से अधिक है. एक दर्शक ने बताया था कि कुछ दिन पहले औरंगाबाद में एक लीटर पेट्रोल का दाम 85 रुपये से अधिक हो गया था. अब वैसे अर्थशास्त्री भी नहीं मिलते हैं जो चार साल पहले पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़ने पर गंभीर लेख लिखा करते थे. लगता है कि वे सारे अर्थशास्त्री लाफ्टर चैलेंज में चले गए हैं. नांदेड़ में 83 रुपये 28 पैसे लीटर, अमरावती में 83 रुपये 3 पैसे लीटर, अकोला में 82 रुपये 79 पैसे लीटर, सोलापुर में 82 रुपये 42 पैसे लीटर और जलगांव में 82 रुपये 18 पैसे लीटर है.

मुंबई में एक लीटर पेट्रोल का दाम 81 रुपये 83 पैसे हो गया है और पटना में 79 रुपये 49 पैसे. इससे पहले भारत की जनता आर्थिक रूप से इनती समझदार नहीं थी वर्ना तो 70 रुपये प्रति लीटर दाम देखकर ही सड़कों पर पुतला दहन होने लगता था. मुझे पता है कि सलमान ख़ान को सज़ा मिली है मगर 83 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल भराने की आज़ादी भी तो इससे पहले नहीं मिली थी. हम खबरों का कोलाज बना रहे हैं ऐसे दिन जब मीडिया ने सलमान ख़ान की गिरप्तारी पर आपकी पूरी तैयारी करा दी है ताकि अगर आईआईटी में कोई भी सवाल आए तो आप घर बैठे पास कर जाएं. हम भी दिखाएंगे, लेकिन अभी नहीं. हम नहीं चाहते हैं कि हमारे दर्शक सलमान ख़ान पर पूछे गए प्रश्न का जवाब नहीं दे सके. दिल्ली में पहली बार पेट्रोल 74 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है.

राहुल गांधी ने जब एक ट्वीट किया तो उसके जवाब में पेट्रोलियम मंत्री धर्में प्रधान ने भी ट्वीट किया और कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों के दाम तय करना राजनीति की तरह एक गंभीर काम है, जिसके इतने अधिक कारक होते हैं, जितने लोकसभा में  कांग्रेस के एमपी नहीं है. एक लिंक साझा कर रहा हूं, उम्मीद है राहुल गांधी इसे पढ़ेंगे और गंभीरता से तर्क करेंगे. धर्में प्रधान ने आपको यह बताया कि पेट्रोल के दाम बढ़ाने के इतने फैक्टर होते हैं जितने कांग्रेस के सांसद नहीं हैं लोकसभा में. इससे पहले जब वे खुद विपक्ष में पेट्रोल के दाम बढ़ने पर विरोध करते थे तब कितने कारण होते थे उन्होंने यह नहीं बताया. धर्मेंद्रप्रधान ने एक और ट्वीट किया, जिसमें कहा कि पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम के पीछे का अर्थशास्त्र ऐसे व्यक्ति को समझ नहीं आएगा, जिसका यथार्थ और तर्क से ज़ीरो कनेक्शन है.

राहुल गांधी चाहें तो एक लेख का लिंक दे रहा हूं उसे देख सकते हैं, बर्शते उन्हें प्रधानमंत्री के भाषण के वीडियो को एडिट करने से समय मिल जाए. निश्चित रुप से जनता के लिए नहीं, लेकिन अपनी भलाई के लिए उम्मीद है कि राहुल गांधी स्वीकार करेंगे कि देश की बेहतरी के लिए अच्छी अर्थव्यवस्था, लोकप्रिय राजनीति से  हमेशा अच्छा होता है. तो देश की बेहतरी के लिए पेट्रोल के दाम 80 पार हैं. ये तो है कि जिस खुशी के साथ जनता ने 80 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल खरीदना शुरू किया है उतना खुश वो कभी 65 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल खरीद कर नहीं होती थी. जनता भी बदल गई? राहुल गांधी ने ऐसा क्या ट्वीट किया था जिससे धर्मेंद्र प्रधान को ऐसा जवाब देना पड़ा.

पेट्रोल का दाम बढ़ना वाकई गंभीर विषय है. विपक्ष का आरोप हल्का था और मंत्री का आरोप भी वैसा ही था. उन्हें बताना था कि फिर वे 65 रुपये प्रति लीटर दाम बढ़ने पर क्यों प्रदर्शन करते थे, तब क्या उनका यथार्थ और लाजिक से कनेक्शन नहीं होता था. बहरहाल 3 अप्रैल के नौकरी सीरीज़ में हमने दिल्ली सबोर्डिनेट स्टाफ सलेक्शन बोर्ड परीक्षाओं की तारीख का एलान नहीं कर रहा है. कई परीक्षाओं का फॉर्म तो हड़प्पा सभ्यता से पहले ही भरा जा चुका था, मगर अभी तक डीएसएसएसबी इम्तान नहीं ले पा रहा था. छात्रों के प्रदर्शन बेकार ही जा रहे थे मगर इस बार का प्रदर्शन काम कर गया. चेयरमैन साहब ने इन्हें बुलाकर आश्वासन दिया है. 2013 से 2018 आ गया मगर परीक्षा नहीं हुई है. अब डीएसएसएसबी की लंबित परीक्षाएं जुलाई में हो जाएंगी.

बोर्ड ने बुधवार को हाईकोर्ट में हलफनामा भी पेश किया है. सोशल ज्यूरिस्ट नाम की संस्था ने कोर्ट में याचिका दायर की है कि दिल्ली सरकार के 9232 और निगम स्कूलों के लिए 5906 शिक्षकों की भर्ती परीक्षा की तारीख घोषित करे. छात्रों से बोर्ड की चेयरमैन ने कहा कि 1 महीने के अंदर परीक्षाओं के कैलेंडर बन जाए और लंबित परीक्षाएं होने लगेंगी. करीब 15000 शिक्षकों की भर्ती नहीं हो रही है, परीक्षा नहीं हो रही है, क्लास ख़ाली रहते होंगे, इसे लेकर कहीं कोई इमरजेंसी चर्चा भी नहीं है. कितना दुखद है. अभी तक इन 15000 लोगों को नौकरी मिल गई होती तो समाज का कितना भला होता. नौजवानों को रोज़गार मिलता और बच्चों को मास्टर. पिछले 7 साल से कोई सीधी बहाली नहीं हुई है. क्या यह मज़ाक नहीं है.

हमारी इस सीरीज़ का असर आयोगों को थोड़ा बहुत हरकत में डाल रहा है. अगर हम रेलवे की वेकेंसी को लेकर बात नहीं करते तो आपको पता ही है कि तीन चार साल से वैकेंसी आनी कितनी कम हो गई थी. यह बात रेलवे ने खुद संसद की स्थाई समिति में माना है. अब जाकर मंत्री जी 1 लाख नौकरियां निकालने को लेकर ट्वीट कर रहे हैं, मगर जो भर्ती पूरी होने का ट्रैक रिकॉर्ड है उससे बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए. रेलवे में भर्ती होने में आम तौर दो से तीन साल लग जाते हैं. हां अगर अक्तूबर नवंबर तक नौकरियां मिल जाए तो क्या बात. हम जैसे ही इम्तहान होगा रेलवे भर्ती पर सीरीज़ शुरू कर देंगे, ताकि नौजवानों को अप्वाइंटमेंट लेटर भी मिले. वैसे कई परीक्षाएं जो पहले हो चुकी हैं उनका अप्वाइटमेंट लेटर आज तक नहीं मिला है. ऐसा कई लोग हमें लिख रहे हैं. 2 लाख 20 हज़ार पद ख़ाली हैं तो वैंकेसी 1 लाख की ही क्यों आई है. बाकी के 1 लाख 20 हज़ार कब आएंगे. क्या बेरोज़गार कम हो गए हैं देश में. 90,000 की वैकेंसी के लिए ही ढाई करोड़ बेरोज़गारों ने फॉर्म भरे हैं.

500 रुपये फॉर्म का था मगर प्राइम टाइम में जब बात उठी तो 100 रुपये करना पड़ गया. नौजवानों को भर्तियों का खेल समझना है. उन्हें पैनी नज़र रखनी चाहिए. नौकरी देने को लेकर जो प्रचार होगा और जो नौकरी दी जाएगी दोनों में समय और अप्वाइंटमेंट लेटर को लेकर कितना अंतर है. गोरखपुर से एक नौजवान ने लिखा है कि, ‘मैंने रेलवे के कैटरिंग इंस्पेक्टर की परीक्षा पास की है. नवंबर 2017 में ही फाइनल रिज़ल्ट आ गया था. अभी मेडिकल टेस्ट और ज्वाइनिंग लेटर का पता नहीं चल रहा है. चीफ पर्सनल ऑफिस गोरखपुर को ट्वीट किया तो जवाब नहीं मिला. अब सुन रहे हैं कि नई नीति के अनुसार कैटरिंग इंस्पेक्टर की ज़रूरत नहीं होगी तो इसमें हमारी क्या ग़लती है.’

वाकई जब परीक्षा दी है तो ज्वाइनिंग होनी चाहिए. 2014 में गोरखुपर बोर्ड की तरफ से इसका विज्ञापन निकला था. चार साल बाद कैसे कह सकते हैं कि अब इसकी ज़रूरत नहीं, जबकि आपने अप्वाइंटमेंट लेटर दिया हुआ है. इस तरह से छात्र कैसे भरोसा करेंगे. इस तरह के कई और मामले हैं. इसलिए रेल मंत्री को एक लाख नौकरियों के विज्ञापन भी करें मगर इस बात पर ज़्यादा ध्यान दें कि नौकरी मिले. छह महीने के भीतर परीक्षा हो जाए. जिन्हें नौकरी मिल जाएगी वो बिना विज्ञापन के ही खुश हो जाएंगे आप चाहें जिनता भी मुद्दा गढ़ लीजिए, जनता अपने ही मुद्दे को टीवी में खोजती रहती है. पिछले कुछ दिनों से एनआईटी मिज़ोरम से छात्र दनादन फोन कर रहे हैं. उन्हें किसने प्राइम टाइम के बारे में बता दिया पता नहीं. लेकिन जो वहां की कहानी सामने आई है उससे यही लगता है कि बकवास प्रवक्ताओं के साथ शाम बिताने से अच्छा है, छात्रों के सवालों को जगह दी जाए.

एनआईटी मिज़ोरम का यह वीडियो है जो छात्रों ने खुद ही भेजे हैं. ये छात्र 31 मार्च की रात से यहां धरने पर बैठे हैं. इनका आरोप है कि प्रशासन की लापरवाही से इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रानिक्स इंजिनयरिंग के प प्रथम वर्ष के छात्र देवशरण की मौत हुई है. देवशरण भी यहां खराब खाना और अशुद्ध पानी के खिलाफ धरना में शामिल था. देवशरण बिहार के खगड़िया का रहने वाला था. 6 मार्च को तबीयत खराब हुई. देवशरण को बाहर जाकर इलाज कराना था क्योंकि इलाज के लिए वहां सुविधा नहीं थी. उसे इजाज़त नहीं मिली. वार्डन का तर्क था कि मिड सेमेस्टर परीक्षा आने वाली है. हम बाद में परीक्षा नहीं लेंगे. इसलिए परीक्षा देकर जाना होगा. 26 मार्च को पहली परीक्षा थी. उसकी तबीयत बिगड़ गई. 27 और 28 मार्च की परीक्षा नहीं दे सका. छात्र ही अस्पताल लेकर गए. वहां बताया गया कि अस्तपाल में बेड नहीं है. इसके बाद 29 मार्च को वह टिकट कटाकर आइजोल से गुवाहाटी गया. एयरपोर्ट से स्टेशन गया वहां बेहोश हो गया. 31 मार्च को देवशरण की मौत हो गई. नाराज़ छात्र देवशरण की मौत के बाद धरने पर बैठे हैं. इनकी मांग है कि मानव संसाधन मंत्रालय के अधिकारी आकर बात करें. यहां का प्रशासन ही दोषी है तो उससे क्या बात करनी.

एनआईटी मिजोरम के समर्थन में एनआईटी मणिपुर, अरुणाचल, मेघालय, उत्तराखंड और श्रीगर के छात्रों ने भी प्रदर्शन किया है. मगर इसकी कहीं कोई खबर नहीं है. कोलकाता टेलिग्राफ ने यह समाचार छापा है. बुधवार को दो छात्रों ने आत्मदाह का भी प्रयास किया मगर छात्रों ने उन्हें किसी तरह रोक लिया. छात्रों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण संस्थान में खाना बहुत खराब मिलता है. उन्होंने जो तस्वीरें भेजी हैं वो भयावह है. हम अपनी तरफ से पुष्टि नहीं कर सकते मगर एक बार के लिए इन छात्रों पर भरोसा करना चाहेंगे. गोभी की ये हालत देखिए. आप इसे सड़ी हुई गोभी न कहें तो क्या कहना चाहेंगे. छात्रों की तस्वीरें बताती हैं कि खाने में पिल्लू निकल आते हैं. दो-दो बार इसे लेकर हड़ताल कर चुके हैं. मगर कोई सुनने वाला नहीं है.

ऐसा तो हो नही सकता कि मानव संसाधन मंत्री को इसकी खबर नहीं हो, अगर नहीं है तो फिर उन अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने मंत्री जी को यह बात नहीं बताई. एक छात्र की जान गई है. अगर हम नौजवानों की जान की कीमत इतना समझेंगे कि उस पर बात तक नहीं करेंगे तो यह ठीक नहीं है. स्लोगन में स्वर्ग नहीं होता है. नौकरी सीरीज़ के कारण हर दिन कुछ नया पता चलता है. हमें नहीं पता था मगर एक मैसेज आया है कि कोई Agricultural Scientists Recruitment Board (ASRB) होता है, जिसने लोअर डिविज़न क्लर्क की परीक्षा के लिए विज्ञापन निकाला. ऑनलाइन आवेदन की तारीख 16 अक्तूबर से 15 नवंबर 2017 थी. नवंबर 2017 में परीक्षा की तारीख निकली, स्थगित हो गई. फरवरी 2018 में परीक्षा की तारीख निकली, स्थगित हो गई. उसके बाद से कुछ पता नहीं है.

भर्ती का विज्ञापन निकालन का पूरे देश भर में एक पैटर्न नज़र आता है. विज्ञापन निकालिए और परीक्षा स्थगित करते रहिए ताकि छात्र उम्मीद की दुनिया में खोए रहें. उम्मीद के नाम पर हम भारतीय कई साल सिर्फ परीक्षा की तारीख के इंतज़ार में ही निकाल सकते हैं. मध्य प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती दो बार निरस्त हो चुकी है. एक बार 2014 में और एक बार 2016 में. दोनों बार छात्रों से फीस ली गई. करोड़ों की फीस. आयोग की कमाई भी हो गई और नौकरी भी नहीं देनी पड़ी. नौजवानों ने बताया है कि नवंबर 2017 में तीसरी बार विज्ञापन निकला. इसके लिए 1150 रुपये फॉर्म के लिए लिए गए. किसी को पता नहीं कि परीक्षा होगी या रद्द हो जाएगी. इसलिए नौजवान चुनावी साल में नौकरियों के विज्ञापन से सावधान रहें. ये आपके गुस्से को भटकाने का तिकड़म भी हो सकता है. आप कहेंगे तो साबित भी कर दूंगा.

source by ndtv
Filed in: इंडिया, टॉप 10, बेबाक कलम, लेखक

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