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‘बदलाव के साथ और भी बलवती हुई हिंदी’

मनोज यादव

मनोज यादव

अन्य दूसरे दिवसों से मै हिंदी दिवस को अलग रखता हूँ। यह दिवस हमारी प्रारम्भिक चेतना और विकास से जुड़ा हुआ है। सिर्फ संविधान में इस दिवस को राजभाषा का दर्जा दिए जाने से सिर्फ औपचारिकता पूरी होती है व्यवहार में हिंदी को तो हम अपने ह्रदय में जगह देकर मुकम्मल बनाते है। हिंदी उतनी ही पावन है जीतनी गंगा उतनी ही पूज्यनीय है जीतनी सरस्वती उतनी ही मजबूत है जितनी हमारी संस्कृति उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी हमारी माँ। भारतीय उपमहाद्वीप में असंख्य बोलियाँ है कई भाषाए जिसमे कुछ का संविधान में उल्लेख है कुछ उससे हटकर वजूद बनाए हुए है। हिंदी का जैसा संविधान में स्थान दिया गया है ठीक उसी तरह यह अपने मौलिक और व्यवहारिक रूप में भी है। संविधान में इस बात का उल्लेख है की हिंदी किसी प्रान्त पर जबरन नहीं थोपी जायेगी राजभाषा का मतलब यह है की यह प्रसाशनिक और राजकीय कार्यो में निश्चित रूप से इस्तेमाल की जायेगी। उसी तरह हिंदी अपनर मौलिक रूप में भी किसी दूसरी भाषा पर अतिक्रमण नहीं करती है और अपने आँगन में उन्हें सम्मानपूर्वक स्वागत करती है। इन्टरनेट के दौर में हिंगलिश को ही देख लीजिये सोचने का तरीका हिंदी है लेकिन लिपि को बदलकर यह और भी लोगो के बीच लोकप्रिय हो जाती है। हिंदी भाषा में विदेशी भाषाओ के शब्द चलन में तेजी से बढ़ रहे है लेकिन फिर भी हिंदी आज उतनी ही जीवंत है जितनी पहले थी। उर्दू भाषा के शब्द हिंदी का श्रृंगार करते है। मुल्क में उदारीकरण नीतियों के बाद ग्रामीणअंचलो में मोबाइल के इस्तेमाल और उससे जुड़े सभी शब्द बढ़ते हुए कम्पुटरीकरण के बाद उससे निकले हुए अंग्रेजी के शब्द भले ही आज अनपढ़ और गवई लोग फक्र के साथ इस्तेमाल कर रहे हो लेकिन इससे हिंदी कतई कमजोर नहीं हुई है। बल्कि उसके शब्दकोष में शब्दों का इजाफा हुआ है इसे हिंदी की मजबूती के रूप में देखा जाय तो बेहतर है। सोशल मीडिया के मुख्य अवयव व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर आज भी लोगो ने अभिव्यक्ति और संवाद का तरीका हिंदी है। यह जरूर है की रोजगार के क्षेत्र में कमजोर हुई हिंदी को अंग्रेजी द्वारा उत्पीड़न किया गया। ग्रामीण क्षेत्रो में बढ़ते अंग्रेजी मीडिएम विद्यालयों की बाढ़ के बाद भी हिंदी का जलवा कायम है। इसकी मधुर मिठास कानो में रस घोलती है अपनेपन का एहसास दिलाती है। संबंधो को मजबूत बनाती है।

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