3:12 am - Sunday September 24, 2017

यहां चौखट से पहले खत्म हो जाती है धर्म की सरहदें

1नई दिल्ली। यह खालिस इंसानियत की बातें करते हैं। धर्म के ठेकेदार तो बैर कराने का काम करते हैं, लेकिन सूफी संतों के साथ उनकी दरगाह भी लोगों में मेल कराती है। कुछ ऐसा ही नजारा निजामुद्दीन दरगाह में इन दिनों देखने को मिल रहा है। जहां की चौखट से पहले धर्म की सरहदें खत्म हो जाती है।

हजरत अमीर खुसरो के 713 वें सालाना उर्स में जियारत करने मुस्लिम ही नहीं काफी संख्या में ¨हदू व पंजाबी के अलावा दूसरों के धर्मो के लोग शामिल हैं। उनके यहां आने की अपनी अपनी वजहें हैं, लेकिन एक बात है कि दुनियादारी से बाहर निकलकर सुकून की तलाश यहां आकर ही पूरी होती है। दरगाह हजरत निजामुद्दीन औलिया के महासचिव सैयद फरीद अहमद निजामी कहते हैं कि यहां श्रद्धा का भाव लेकर आने वाले लोगों में मुस्लिमों से अधिक संख्या ¨हदुओं की होती है। हाल के सालों में उनकी संख्या में इजाफा ही देखने को मिला है। ऐसे ¨हदुओं की संख्या बहुत है जो कई दशकों से यहां आ रहे हैं और बिना किसी दिखावे के लोगों की सेवा और प्रार्थना कर रहे हैं। कुछ उर्स के इंतजाम में टेंट लगवाते हैं तो कुछ मजार पर लाइटों का इंतजाम करवाते हैं।

दरगाह आकर 90 वर्षीय कंवल नैन के दिल की भूख होती है शांत

निजामुद्दीन दरगाह परिसर में चाय और बिस्कुट बांटते बुजुर्ग कंवल नैन और उनके आस-पास बच्चों और महिलाओं की भीड़ अनायास अपनी ओर खींच लेती है। पूछने पर वह बताते हैं कि जैसे पेट की भूख खाना खाने से मिटती है उसी प्रकार उनके दिल की भूख दरगाह आकर मिटती है। वह पिछले 65 सालों से नियमित तौर पर रोजाना शाम को दरगाह पहुंचते हैं और आए जायरीनों की सेवा में जुट जाते हैं। लाजपत नगर में रहने वाले नैन बताते हैं कि यह कोई वर्ष 1952 की बात है जब वह दरगाह आए थे और 40 दिन रोजाना आने का व्रत लिया। उस व्रत ने दरगाह से उन्हें ऐसा जोड़ा कि फिर अब अंतिम सांस तक साथ निभाने का वादा है। वह बताते हैं उनकी शादी हुई तब वह पत्‍‌नी के साथ आए। बेटी और बेटों की शादी भी यहीं से हुई।

मिलता है सुकून यहां

गुरुग्राम में एक कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर प्रियंका को दरगाह आकर सुकून मिलता है। वह 15 सालों से नियमित तौर पर दरगाह आती हैं। द्वारका से उनको यहां पहुंचने में कोई ढाई घंटे पहुंचने में लग जाते हैं, लेकिन चेहरे पर कोई थकान का निशान नहीं है, बल्कि यहां की फिजाओं में गूंजने वाला संगीत उनके रूह को सुकून देता है। वह कहती हैं दुनियादारी से जब थक जाती हैं तो औलिया की शरण में आ जाती हैं। वैसे, वह निजामुद्दीन के सालाना उर्स में हर वर्ष शिरकत करती हैं। खुसरो के उर्स में पहली बार आई हैं।

यहां पर धर्म व जाति की बात इसलिए नहीं होती। यह आपसी सद्भाव इसलिए दिखता है क्योंकि निजामुद्दीन और खुसरो ने प्रेम और आपसी भाईचारे की बात की। देश की गंगा यमुना तहजीब की पैरोकारी की।

सैयद अनफल निजामी, दरगाह

धार्मिक नेता तो लड़ाने की बात करते हैं। चाहे यह मुल्ला मौलवी ही क्यों न हो। यह जो आतंकवाद फैला है यह इस कारण ही है। ऐसे में खुसरो का संदेश ज्यादा मौलिक हो जाता है। खास बात कि आपसी भाईचारे के मामले में ¨हदुस्तान जैसा कोई दूसरा मुल्क नहीं है ।

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