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ये चीज पहनने से नहीं होता जादू-टोने का असर!

blast-newsप्राचीनकाल में मालदीव कौड़ियों की राजधानी के रूप में प्रख्यात था। इसका पुरातन नाम ‘दिवाब कवध’ था, जिसका अर्थ है- कौडिय़ों का द्वीप। कवध अथवा कदप कौड़ी का संस्कृत नाम है। भगवान शंकर का एक नाम कपदीन भी है क्योंकि उनकी जटाओं की बनावट कौड़ियों से मिलती-जुलती है। कौड़ियों का संसार अत्यंत विस्तृत है। उसकी प्राप्ति जल से है। यह आश्चर्यजनक है कि उनको एकत्रित करने का ढंग प्राचीनकाल से ही अपरिवर्तनीय रहा है। प्राचीन शास्त्रों में वर्णन है कि नारियल के तालपत्र जलाशय तथा उथले समुद्र की सतह पर बिखरा दिए जाते थे, कौडिय़ां इनसे चिपक जाती थीं और समय आने पर उन्हें निकालकर समुद्र के किनारे पर सुखा लिया जाता था। आज भी ऐसा ही किया जाता है।

प्राचीन काल में कौड़ी मुद्रा के रूप में प्रचलित थी। इसका प्राचीनतम उदाहरण मिस्र स्थित एक मकबरे में दीवारों पर बने एक चित्र में देखने को मिलता है। दीवार पर अंकित बाजार के एक दृश्य में विक्रय के लिए रखी वस्तुओं में कौडिय़ों की एक कतार भी दिखाई देती है। यह चित्रण पिरामिड काल से भी पहले का है।

कौड़ियों पर किया गया शोध अपर्याप्त है और इसकी खोज की जानी चाहिए। मुद्रा के रूप में कौड़ियों का प्रचलन कब बंद हुआ, यह निश्चित रूप से कहना कठिन है। पर इसके दो कारण कहे जाते हैं, पहला तो यह कि चीन जैसे दूरस्थ देश में कौडिय़ों का प्रदाय अनियमित था इससे व्यापार में बाधा पड़ती थी। दूसरा कारण था समुद्र के आसपास के क्षेत्र में कौडिय़ों का बहुतायत में पाया जाना जो मुद्रास्फीति का कारण होती थी। ये कारण आज की मुद्रा समस्याओं की तरह ही थे।

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भारतीय संस्कृति का कौड़ी से गहरा नाता है। प्रजनन क्षमता तथा शिशु जन्म संबंधी पुरानी कथाओं में कौड़ी के विषय में अनेक रहस्यमयी बातें सुनने को मिलती हैं। अनेक समाजों में विवाह संस्कार में कौड़ी को बहुत महत्व दिया जाता है, वह शुभ समझी जाती है। राजस्थान में विवाह-मंडप को कौड़ियों से अलंकृत किया जाता है और दुल्हन की कलाई में कौड़ी बांधी जाती है। वहां दुल्हन की विदाई के समय उसके केशों को कौड़ी से सजाने की प्रथा है।

पंजाबी दुल्हनें गहना, कलीरे पहनती हैं, जिसके फुंदने में कौड़ी लगी रहती है, जो कलाई से लटकती रहती है। असम की अहोम जाति में बुजुर्ग दूल्हा-दुल्हन के कान के पास कौड़ी हिलाते हैं। उनकी मान्यता है कि ऐसा करने से कौड़ी में वास करने वाली जनन क्षमता की देवी उन्हें अच्छी संतति का वर देती हैं।

धार्मिक उत्सवों और अनुष्ठानों में भी कौड़ी का महत्व है। अनेक लोग पूजा के स्थान में शंख के साथ कौड़ी भी रखते हैं। दीपावली के अवसर पर गोवर्धन पूजा में गायों के गले में कौडिय़ों की माला पहनाते हैं।

कोरकू जनजातियों के लोग बैल के गले में कौड़ी मालाएं, मूंगा मालाएं व घुंघरू मालाएं पहनाते हैं। सींगों के ऊपरी भाग में मोर पंख लगाते हैं। जनजातियों में आभूषण के तौर पर कौड़ी का उपयोग होता है, नृत्य के समय कौड़ियों से साज-सज्जा करना अनेक प्रजातियों में प्रचलित है।

कहते हैं कौड़ी धारण करने से जादू या टोना का असर नहीं होता। करमा नृत्य में नर्तक कौड़ियों के कमर पट्टे बांधते हैं। बस्तर के आदिवासी मड़ई के समय अपने देव एलपू का घंटियों और कौड़ियों से अलंकरण करते हैं।

कुछ जनजातियों में कौड़ी शौर्य का प्रतीक है। देशी चिकित्सा पद्धतियों में भी कौडिय़ों का उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद सिद्ध तथा यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में पाचन शक्ति की गड़बड़ी, आंख, कान, हृदय तथा किडनी आदि से संबंधित रोगों के उपचार तथा अच्छी मात्रा में कैल्शियम उपलब्ध कराने के लिए भी कौड़ी का उपयोग किया जाता है। सर्प दंश के मामले में भी कौडिय़ों का उपयोग किया जाता है।

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