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राज्य चयन आयोगों का नौजवानों से खिलवाड़ क्यों?

bhaiबेरोज़गारी से किसी को डर क्यों नहीं लगता है. इसका एक छोटा सा जवाब है. जब किसान आंदोलन करते हैं तो बाकी समाज उन्हें छोड़ देता है. जब बेरोज़गार प्रदर्शन करते हैं तो बाकी समाज उन्हें भी छोड़ देता है. न किसान बेरोज़गारों का साथ देते हैं और न बेरोज़गार किसानों का.

भारत के बेरोज़गारों के लिए एक अलग से न्यूज़ चैनल होना चाहिए. उनकी समस्याएं बहुत हैं और जटिल भी हैं. कोई ठोस संख्या तो नहीं है मगर कोई बहाली निकलती है तो दस से बीस लाख छात्र फार्म भरने लगते हैं. इस अंदाज़ से आप देखेंगे तो पाएंगे कि देश भर में करोड़ों की संख्या में छात्र भांति भांति की सरकारी नौकरियों की तैयारी में पसीना बहा रहे हैं. फिर भी इनकी सुनवाई क्यों नहीं है. बेरोज़गारी से किसी को डर क्यों नहीं लगता है. इसका एक छोटा सा जवाब है. जब किसान आंदोलन करते हैं तो बाकी समाज उन्हें छोड़ देता है. जब बेरोज़गार प्रदर्शन करते हैं तो बाकी समाज उन्हें भी छोड़ देता है. न किसान बेरोज़गारों का साथ देते हैं और न बेरोज़गार किसानों का. इसलिए किसी की आवाज़ की कोई ताक़त नहीं रह जाती है. कई बेरोज़गारों ने बताया कि उनके परिवार के लोग भी उनका साथ नहीं देते हैं.

छात्रों से बातचीत के बाद लगता है कि कई राज्यों के चयन आयोग नौजवानों को उल्लू बनाने का सरकारी कारखाना भर हैं. इनका काम नौकरी देना नहीं बल्कि नौकरी के नाम पर झांसा देना है. ये फार्म निकालते हैं, फिर नकल होने देते हैं, फिर तीन चार बार इसके नाम पर और पांच छह बार कोर्ट केस के नाम पर परीक्षा लटका देते हैं. किसी की नौकरी हो भी जाती है तो ज्वाइनिंग लेटर नहीं देते हैं.

रवीश कुमार की कलम से

रवीश कुमार की कलम से

22 जनवरी को कोई डेढ़ दो सौ छात्रों ने दिल्ली के सीजीओ कांप्लेक्स में मार्च निकाला. आस-पास के राज्यों से आए ये छात्र स्टाफ सलेक्शन कमिशन की परीक्षा में पास हो चुके हैं. इनकी ज्वाइनिंग की चिट्ठी नहीं आ रही है. पहले परीक्षा के लिए इंतज़ार करो, फिर पास होकर ज्वाइन करने की चिट्ठी का इंतज़ार करो. तो एसएससी के पास हुए छात्र अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन करते रहते हैं. इनका मामला कोर्ट में भी लटका रहता है. दूसरी तरफ जिनका नहीं हुआ है वो इसकी शिकायत करते रहते हैं कि एक ही परीक्षा में अलग-अलग दिन अलग-अलग स्तर के सवाल पूछे जाते हैं. किसी दिन पेपर हल्का होता है किसी दिन बहुत भारी होता है. कई तरह की जटिलताओं का बहाना बनाकर जो पास हुए हैं उनकी ज्वाइनिंग नहीं हो रही है. हमारे सहयोगी मुन्ने भारती 22 जनवरी के मार्च के समय दिल्ली के सीजीओ कांप्लेक्स गए थे जहां ये छात्र तख्ती बैनर लेकर आए थे. 18 जनवरी को पटना में भी एसएससी के पास हुए छात्रों ने रैली निकाली थी. आप छात्रों की बातें सुनिये फिर आराम से सोचिए कि इस वक्त क्या करने की ज़रूरत है. छात्रों को पुलिस ने हटाने का प्रयास किया तो फूल देकर समझाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं. इन छात्रों का कहना है कि वे जब कोर्ट में गए कि उनकी ज्वाइनिंग जल्दी हो जाए तो इस मामले की सुनवाई की तारीख 21 सितंबर मिली है जिससे वे काफी परेशान हो गए हैं. ऐसे तो पास होने के बाद ज्वाइनिंग होने में भी एक साल बीत जाएगा.

शुक्रवार को स्टाफ सलेक्शन कमिशन के चेयरमैन ने अपनी संस्था की वेबसाइट पर देरी के कारणों और समाधान पर एक लंबा पत्र डाला था. छात्रों को अभी भी आशंका है कि ये सिर्फ आश्वासन देकर मामले को लटकाने का तरीका हो सकता है. पत्र के प्वाइंट नंबर 9 में कहा गया है, ‘कमिशन ने दिसंबर 2017 को भारत सरकार के कार्मिक विभाग और कानूनी मामलों के विभाग से संपर्क किया. अनुमति मांगी कि इस मामले में कैट के आदेश के खिलाफ अपील की जाए. कानूनी समीक्षा के बाद सरकार ने पाया कि इसे दिल्ली हाईकोर्ट में चैलेंज करना चाहिए. अगर ज़रूरत पड़ी तो आयोग सुप्रीम कोर्ट भी जाएगा. आयोग जनवरी के आखिरी सप्ताह में अपील फाइल करेगा. फरवरी महीने के आख़िर में जिन विभागों के लिए छात्र सफल हुए हैं, उनके यहां से ज्वाइनिंग की चिट्ठी आने लगेगी. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि असफल उम्मीदवारों के केस करने की वजह से अवांछित देरी हुई है.’

चेयरमैन ने अपने पत्र में कहा है कि जिनका हो गया है, अभी सफल लोगों को ज्वाइनिंग की चिट्ठी दी जाएगी. अगर रिजल्ट की समीक्षा होती है और किसी की उम्मीदवारी रद्द होती है तो उसकी नौकरी चली जाएगी. इस व्यवस्था के साथ पास हुए छात्रों को ज्वाइन कराया जा सकता है. 22 जनवरी को चेयरमैन ने दो छात्रों को भी बुलाया. उनसे बात की लेकिन छात्र संतुष्ट नहीं हुए.

भारत के नौजवान व्यवस्था के आगे मजबूर हैं. बिहार के मुज़फ्फरपुर से एक छात्र ने हमें बताया, आप भी हैरान रह जाएंगे. प्राइम टाइम में इस वक्त जनसुनवाई का मॉडल चल रहा है. हम ध्यान रखेंगे लेकिन पहले लोगों की बात रखेंगे, उसके बाद अगर चयन आयोग के अध्यक्ष को लगता है कि हमारी बात सही नहीं है, प्रतिक्रिया देनी चाहिए तो वे हमसे संपर्क कर सकते हैं, हम उनका जवाब भी दिखा देंगे. फिलहाल छात्रों ने जो बताया है वो किसी भी मानसिक अवस्था में यकीन करने लायक नहीं है. आप सुनकर ख़ुद से यकीन खो देंगे. 2014 में बिहार ssc chsl के लिए 13,500 वेकैंसी आई. एक फार्म की कीमत 350 रुपये थी, 27 लाख फार्म भरे गए. इस हिसाब से आयोग ने 80 से 90 करोड़ छात्रों से कमा लिए. 2014 से 2018 आ गया, इस वैकेंसी से जुड़ी एक भी परीक्षा नहीं हुई है.

22 जनवरी यानी सोमवार के दैनिक जागरण में भी यह ख़बर है कि बिहार सरकार ने इंटर स्तरीय पदों की भर्ती के लिए साल 2014 में आवेदन निकाला, सरकार के अलग-अलग विभागों में 11,000 से अधिक पदों पर नियुक्ति के लिए सरकार ने वैकेंसी निकाली. 18 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने फार्म भरे. बहुत इंतज़ार के बाद 2017 में परीक्षा का आयोजन हुआ, लेकिन धांधली होने के कारण परीक्षा रद्द हो गई. उसके बाद छात्र दोबारा परीक्षा का ही इंतज़ार कर रहे हैं. स्नातक स्तरीय परीक्षा के लिए भी 2014 में नोटिफिकेशन जारी हुआ था. 2015 में परीक्षा हुई, पीटी हुई, मेन्स की परीक्षा हुई, परीक्षा का फाइनल रिज़ल्ट आ गया है मगर नियुक्ति पत्र जारी नहीं हुआ है. पास कर के भी छात्र घर बैठे हैं. एक और अखबार के कतरन से पता चलता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन चयन आयोगों को भर्ती का कैलेंडर बनाने को कहा है. हिन्दुस्तान अखबार के अभिषेक कुमार की इस रिपोर्ट में बिहार राज्य कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष संजीव सिन्हा ने कहा है कि परीक्षा का कैलेंडर बन रहा है. कर्मियों की कमी है. बताइये जिसका काम कर्मचारियों की भर्ती करना है, उसके पास भी कर्मचारियों की कमी है. तो पहले उसे अपने लिए ही बहाली कर लेनी चाहिए.

15-16 हज़ार पद ख़ाली हैं, उन पर बहाली की प्रक्रिया पूरी नहीं हो रही है. इस बीच बहुत से छात्रों की उम्र सीमा भी निकल जाती है, वे अंशकालिक बेरोज़गार से आजीवन बेरोज़गार हो जाते हैं. नौजवानों के साथ होने वाला यह सबसे बड़ा घोटाला है. आयोगों के पास बहाने बहुत हैं. हमें रेलवे के परीक्षार्थी और राजस्थान से बड़ी संख्या में नौजवान पत्र लिख रहे हैं, आप धीरज रखिए, हम आपकी भी परेशानी दिखा देंगे, झारखंड से हमारी रिपोर्ट तैयार थी मगर 19 जनवरी को दिल्ली के 20 विधायकों का मामला आ गया इसलिए हम नहीं दिखा सके.

झारखंड लोक सेवा आयोग. इसकी इमारत तो काफी ठीक ठाक है, मगर इसका रिकॉर्ड बहुत ख़राब है. 17 साल हो गए झारखंड को बने हुए मगर एक भी परीक्षा का आयोग बग़ैर धांधली और भ्रष्टाचार के आरोपों के बग़ैर नहीं हो सका है. यह आयोग राज्य के लिए प्रशासनिक अधिकारियों का चुनाव करता है जैसे डिप्टि कलक्टर, डिएसपी, दारोगा, तहसीलदार एटसेट्रा, एटसेट्रा, आदि आदि. आयोग के बाहर फार्म भरने की दुकान है. जब हमारे सहयोगी हरबंस वहां पहुंचे तो एक भी फार्म इस आयोग का नहीं बिक रहा था. जेपीएससी ने बैच नंबर एक और दो के लिए जो बहाली की थी, उसकी कुछ साल बाद जांच हुई तो पाया गया कि परीक्षा की जगह धांधली हुई है.

अब हम जो कहानी बताएंगे उसे ध्यान से सुनिएगा, यह सिर्फ आपके बच्चे का सवाल नहीं है, आपका भी है, क्योंकि हो सकता है कि इन्हीं सब सरकारी चतुराइयों के कारण आप भी अच्छी नौकरी न पा सके हों. तो आप प्राइम टाइम के इस शो को बैक डेट से फील कर सकते हैं. यह एक ऐसे इम्तहान की कहानी जिसका फार्म भरा जाता है जनवरी 2015 में लेकिन जनवरी 2018 तक कोई अता पता नहीं है. यह कथा झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की है. छठी जेपीएससी परीक्षा की है. डीएसपी, बीडीओ, सीओ, रजिस्ट्रार, एडीएम के 326 पदों पर भर्ती का विज्ञापन निकला. जनवरी 2015 में इसका विज्ञापन निकलता है. आठ महीने बाद अगस्त 2015 में फार्म भराया जाता है. छह महीने बाद बताया जाता है कि सिलेबस चेंज हो गया है, दोबारा फार्म भरें. दोबारा छात्र 500-500 रुपये देकर फार्म भरते हैं. जनवरी 2016 तक यही चला. एक साल तक फार्म ही भराया जाता रहा. 18 नवंबर 2016 को पीटी की परीक्षा होती है, फरवीर 2017 में रिज़ल्ट आता है. पीटी में 5024 छात्र पास हुए मगर रिज़ल्ट में गड़बड़ी पाई गई. 206 नंबर वाला पास था, उससे अधिक 260 नंबर वाला फेल था. इसके बाद आंदोलन हुआ, मामला राज्य कैबिनेट में गया. वहां फैसला हुआ कि 206 से ऊपर के सभी छात्रों को पास किया जाए. फिर जून 2017 में कोर्ट से भी यही फैसला आया, 965 छात्र और पास हुए.

कहीं आपने सुना है कि कैबिनेट की मीटिंग में कटऑफ तय होता हो, छात्रों के पास होने का निर्णय होता हो. बहरहाल जनवरी 2015 से जून 2017 आ गया. दो साल से ज़्यादा समय लग गया पीटी का रिजल्ट निकल आने में. अब सुनिये इसकी मेन्स की परीक्षा का किस्सा. नवंबर 2017 में मेन्स की परीक्षा का डेट निकलता है, लेकिन वह अपरिहार्य कारणों से स्थगित हो जाती है.

ऐसा नहीं है कि इस समस्या के बारे में किसी को पता नहीं है. छात्रों ने जो धांधली के किस्से बताए हैं उनकी पुष्टि नहीं कर सका हूं मगर आम बात हो गई है कि वहां सीट बिक जाती है. छठी जेपीएससी की समस्या को लेकर छात्र झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास से भी मिले थे. एक नई तारीख निकली है कि 29 जनवरी 2018 से मेन्स की परीक्षा होगी मगर छात्रों को भरोसा नहीं हो रहा है. कई छात्रों की ज़िंदगी बर्बाद हो गई. आप उनसे बात कीजिए, रो देंगे. कइयों के माता-पिता दुनिया से चल बसे इस इंतज़ार में बेटा कंपटिशन में पास कर अफसर बनेगा.

अब हम झारखंड की एक और परीक्षा का हाल बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आपको भरोसा होगा कि भारत के युवाओं को क्यों वही वाला टॉपिक दिखाया जाता है. ताकि वे धार्मिक उन्माद में फंसे रहें और संस्थाओं की गिरावट को अपनी आंखों से न देख सकें. आपने अभी झारखंड लोक सेवा आयोग की दुर्दशा देखी, अब आप झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग की दशा देखिए. 28 दिसंबर 2015 को 551 पदों के लिए विज्ञापन निकलता है. सयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा का विज्ञापन. आवेदन की अंतिम तिथि 28 जनवरी 2016 रखी जाती है. क्या ये वाकई आख़िरी तारीख थी, नहीं. फरवरी 2016 में इसी परीक्षा के सिलसिले में एक और विज्ञापन निकलता है. इसमें प्रखंड कृषि पदाधिकारी, अनुसंधान अधिकारी जैसे चार नए पद जोड़े गए. अब फार्म भरने की अंतिम तिथि हो जाती है 15 मार्च 2016. फार्म की कीमत 460, 380 और 115 रुपये रखी गई. तीसरी बार फिर से विज्ञापन निकलता है, जून जुलाई 2016 में. इस बार 6 और पद इसमें जोड़ दिए गए.

आप कुछ खेल समझ पाए. इसका मकसद लगता है नौकरी देना नहीं है बल्कि नौकरी के नाम पर युवाओं को टहलाते रहो. तुम फार्म भरते रहो, हम भारत को विश्व गुरु बनाने में लगे हैं. बहरहाल तीसरे विज्ञापन तक आते आते पदों की संख्या 551 से बढ़कर 1080 हो गई. अब बताइये उम्मीद किसे नहीं होगी. 28 दिसंबर 2015 को जिस परीक्षा का विज्ञापन निकला था, उसकी प्रारंभिक परीक्षा होती है 21 अगस्त 2016 को. दो लाख पैंतीस हज़ार छात्रों ने फार्म भरा था. 21 अक्टूबर को प्रीलिम्स का परीणाम आया, तय हुआ कि 27 नवंबर 2016 को मेन्स की परीक्षा होगी. 13 नवंबर को अख़बारों से पता चलता है कि परीक्षा रद्द हो गई है. नई तारीख की घोषणा बाद में होगी. 4 फरवरी 2017 को अपरिहार्य कारणों से पूरी परीक्षा ही रद्द कर दी जाती है. अपरिहार्य कारणों से.

ऐसा लगता है कि परीक्षाएं एलियन लेकर भाग जाते हैं. 28 दिसंबर 2015 से शुरू हुई परीक्षा की प्रक्रिया 4 फरवरी 2017 को रद्द होने पर खत्म होती है. दो साल स्वाहा. जवानी स्वाहा. सपने स्वाहा. उम्मीद स्वाहा. इसीलिए टीवी पर वही वाला मुद्दा लाया गया ताकि इन्हें लगे कि कुछ हो रहा है. स्वाहा हो रहा है मगर पता नहीं चले कि स्वाहा हो रहा है. 3 फरवरी 2017 को झारखंड के कार्मिक विभाग ने रद्द करने के कारणों को बताते हुए एक पत्र जारी किया था, जिसका एक हिस्सा पढ़ कर हम आपको सुनाना चाहते हैं. अगर आप इसे सुनते ही समझ जाएंगे तो मैं जनवरी में आपको आम खिलाऊंगा.

“पहले कहा गया कि 6 पदसमूहों के कुल पदों के 15 गुणा अभ्यर्थियों का परीक्षाफल प्रकाशित हुआ, कृषि पदाधिकारी, सहायक अनुसंधान पदाधिकारी के 250 पदों पर केवल 1731 अभ्यर्थियों ने ही आवेदन किया इसलिए 15 गुना जो 3750 होता की बजाए सभी 1731 अभ्यर्थियों का परीक्षाफल प्रकाशित किया गया. 3336 अभ्यर्थियों को रोल नंबर पद समूह 1 के अलावा दूसरे पद समूह में भी शामिल हो गए हैं इसलिए वास्तविक रूप से 15 गुना परिणाम नहीं है और 3336 अभ्यर्थियों के मुख्य परीक्षा में शामिल होने से वंचित होना पड़ रहा है. मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मुख्य सचिव, अध्यक्ष झारखंड कर्मचारी चयन आयोग के साथ बैठक हुई. इसमें यह भी विचार किया गया कि प्रारंभिक परीक्षा एवं मुख्य परीक्षा के लिए पाठ्यक्रम का विषय एक ही रखा गया है जिसके कारण विशिष्ट पदों के लिए विशिष्ट योग्यता से संबंधित ज्ञान की जांच नहीं हो पाती है.

समझ आया हो तो बता दीजिए. दो साल बाद परीक्षा रद्द होने के ऐसे कारण भी नसीब से मिलते हैं. हम यही समझे कि जितने आवेदन आए थे उससे कम लोगों ने आवेदन किया, इसलिए सभी को पास कर दिया गया था. इसलिए रद्द कर दिया गया.

ये उन पांच हज़ार पत्रों की तस्वीर है जो छात्रों ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए थे. इसी 19 जनवरी को प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मिला है. जवाब इनके सवालों से संबंधित कम है मगर जो दावा किया गया है वो कमाल का है. पहले आप पढ़ि‍ए.

झारखंड सरकार राज्य सरकार में रोजगार उपलब्ध कराने हेतु प्रतिबद्ध है. सरकार के द्वारा वर्ष 2016 को नियुक्ति वर्ष 2016 घोषित किया गया. अब तक 62,896 पदों पर नियुक्ति की चुकी है. 36,661 पदों पर नियुक्ति की कार्रवाई प्रक्रियाधीन है.

हमने पत्र का पूरा हिस्सा नहीं पढ़ा है. लेकिन सोचिए. जिस झारखंड सरकार के दो विभाग, झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग 1000-500 पदों की बहाली दो से चार साल में पूरी नहीं कर पाते हैं, वो झारखंड सरकार एक साल में 62 हज़ार से अधिक बहाली कर देती है. ये बहालियां किसने की, क्या लोकसेवा आयोग और राज्य कर्मचारी चयन आयोग ने की, या किसी और ने की, हमारे पास पुख्ता जानकारी नहीं है. बस यही जानकारी है कि नौजवानों की जवानी बर्बाद हो रही है. अब तो भगवान का भी नहीं, पकौड़े का ही सहारा है.

SOURCE BY NDTV

 

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