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शिव के लोककल्याणकारी किरदार को अपनाने की दरकार

1-copyशिव की बात आती है तो हमारी स्मृतियों में समुद्र मंथन के बाद निकले विष से मचे हाहाकार और उसके बाद भगवान शंकर का लोक कल्याणकारी किरदार आँखों में उभर आता है। उन्होंने जहर को अपने गले से उतार कर खुद को भगवान कहलाने की महत्ता को प्रकट किया। भगवान भोलेनाथ की छवि हमारी आँखों में तब भी उतर जाती है जब भागीरथ ने कठोर तप करके माँ गंगे को धरती पर अवतरित करने का अनूठा कार्य किया और उस समय भी शिव की जटाओ से निकल कर माँ गंगे ने धरती की प्यास को बुझाया और मानवता की राह में भगवान कहलाने के हकदार बने। भगवान भोलेनाथ इतने संकल्पित और अडिग थे की अपने पुत्र गणेश को भी उन्होंने नहीं बख्सा और सजा के तौर पर उनका सर काटकर उन्हें कठोर दंड दिया। महाशिवरात्रि का पावन पर्व हमें शिव के तमाम रूपों और कल्याणकारी किरदार को हमारे समक्ष रखता है। उनके जैसा मस्तमौला और फकीरी किसी अन्य देवता में हमें नजर नहीं आती है। पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के बाद ही वह ऐसे देवता रहे जिन्होंने मानव जीवन की जिंदगी को जीने की कला सिखाया। आज के दौर में जब सभी लोग स्वार्थ और संकीर्ण मानसिकता के दौर से गुजर रहे है तब भोलेनाथ का जीवनदर्शन हमें कुछ बेहतर करने की सीख देता है। पर अजीब विडम्बना यह है की भगवान कृष्ण से मानव ने प्रेम के नाम पर नंगा नाच सीखा और भगवान भोलेनाथ के नाम पर भांग खाकर समाज में विसंगतियों को जन्म देना सीखा।

मनोज यादव संवाददाता

मनोज यादव संवाददाता

आज के वर्तमान दौर में और महाशिवरात्रि के अवसर पर सभी लोगो को उनके लोक कल्याणकारी किरदार को अपनाने की दरकार है। वह ईश्वर के रूप में मानव को प्रक्षिक्षण देने वाले देवता थे आज वह इसलिए नहीं है क्योकि उनका दर्शन आज लोपित और विलोपित है। फिर से सम्यक विश्व में कल्याण की अनुपम भावना के विकास के लिए शिव के उस तमाम कल्याणकारी रूपों को अपनाने की आवश्यकता है। भगवान को भोलेनाथ इसलिए कहा जाता है की वह इतने भोले थे की असुरो के तप पर जल्द ही प्रसन्न होकर उनके मनमाफिक वरदान उन्हें दे देते थे। लेकिन आज के दौर में हर मानव के भीतर असुरी प्रवित्तिया कायम हो रही है। भोले वही है लेकिन हम कहा है इसकी पड़ताल की जरूरत है।

 

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