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स्वच्छ साहित्य,नवोदित कवियों और चुटकला रहित मंचो के लिये आजीवन लड़ता रहूँगा : बेबाक जौनपुरी

बेबाक जौनपुरी

बेबाक जौनपुरी

नई दिल्ली(विनोद कुमार गुप्ता) : राष्ट्रीय कवि अनित्य नारायण मिश्र “बेबाक जौनपुरी” जी से खास मुलाकात मे नित साहित्य के गिरते स्तर पर खास बातचीत मे उन्होनें कहा कि कभी एक वह युग भी हुआ करता था!
जब साहित्य वाचिक परम्परा में लोग कवियो को आग्रह पूर्वक बीच रास्ते में रोक कर लोग उनके वार्तालाप मध्य ही एक अच्छे खासे कवि सम्मेलन का आनंद ले लिया करते थे! यह ज्यादा समय पहले की बात नही है, मेरी आंख से देखे गए दृश्य है! पान की दूकान पर मैने स्वयं बाबा नागाअर्जुन को कविता सुनाते देखा!अपने पिता पंडित महानंद मिश्र (नंद जौनपुरी) को मार्ग में कविता वांचते देखा था! और भी अनेक ऐसे जन कवि हुए, जिनके लिए कविता जन जाग्रति का नैतिक धर्म मात्र थी! वह दौर और था, अब दौर और है! अब कविता का बाजारीकरण हो चुका है, लिफाफा प्रथा है! कविताओ के नाम पर बाजार में सस्ती पैरोडीकल रचनाएं…फास्टफूड की तरह तैयार हो चमकीले पैकिट में बिक रही है! कविता के नाम पर दो एक रूपसी देवर-भौजाई जीजा-साली के अंदाज में चवन्नी छाप शायरी करती नजर आ जाती है!
फिर कुछ हँसोड़ जोकर टाइप बात करने वाले लाफ्टर कवि के परिधान में महिमा मंडित होते देखे जा सकते है!
ओज के नाम पर गला फाड़ कर चीखना!
यही हाल पूरे विश्व में मंचीय कविताओ का है! समाजोपयोगी साहित्य न कोई रच रहा है,न कोई इस दिशा में बढ़ना चाहता है! कारण स्पष्ट है, जनता को सस्ती कविताओ व वास्तविक कविताओ से दूर कर देने का सोचा समझा मार्केटिंग कांसेप्ट धीमे ज़हर की भांति प्रचारित व प्रसारित किया गया! जो अब अपना असर दिखाने लगा है!
कविता के क्षेत्र में अपनी अपनी कम्पनियां खोल वे लोग बैठ गए जिनको तुकांत मिलाने का ज्ञान नही!
वे कविता के सिरमौर बन बैठे है! कारण वास्तविक कवि को अपनी रचनाधर्मिता से समय नही, कि वह मंचो का भी जुगाड़ सीखें… लगाए! वही तुकबंदी वाले कवि पूरे पूरे दिन केवल मंचो के जुगाड़ में भिड़े रहते है!
अब लालकिला कवि सम्मेलन की बात ही ले लीजिये!
देश का सर्वोच्च मंच है, वहां पहुंचने के लिए कवि के लिए कुछ अहर्ता कुछ मानक तो होने चाहिये ! लेकिन केवल नेताजी के एक फोन पर उन कवियो का चयन होते देखा है, जिन्होंने कभी गोष्ठी भी नही पढ़ी! वे भी इस प्रतिष्ठित कवि सम्मेलन में पढ़ लेते है! मंचीय हथकंडो में शराब शबाब की भूमिका से कौन अनजान है! जिनकी आधी से ज्यादा आयु बीत चुकी है, वे अपनी बेटी समान कवयित्री पर लार टपकाते पाए जाते है! यूट्युब उठाएं ऐसे कई खूबसूरत चेहरे आपको पैरोडी पढ़ते कवयित्री के रूप में मिल जाएंगे! एक छिछोरा सा आदमी मुंह पर माइक लगाए, कहता है, “अब मैं रात के दो बजे कवि सम्मेलन की इस महफिल में एक ऐसी हुस्न फुलझड़ी कबूतरी….. ओ ओ ओ सॉरी कवयित्री को बुलाने जा रहा हूँ, आवाज देने जा रहा हूँ… जिनके देखने सुनने के लिए नगर के भूतपूर्व नौजवान भी दिल थामे बैठे है!

अरे करम जले तू कवयित्री बुला रहा है, या नाचनेवाली??

लेकिन साहब उस संचालक की इस भद्दी टिप्पणी पर कोई प्रबुद्ध व्यक्ति विरोध नही करता! हां लोफर टाइप श्रोता सीटी जरूर बजाने लगते है!

जो कविता संस्कारवान बनाने के लिए माँ शारद की वीणा से निकली वह आज गंगा की तरह दूषित हो कर मन मैला करने लगी… !
जो कविता साहित्य चरित्र निर्माण का कारखाना माना जाता था, वह कुछ लोगो के कारण सस्ते मनोरंजन का स्थल बन गया! हमें जागना भी होगा और जगाना भी होगा! सस्ते व फूहड़ साहित्य का विरोध करना होगा, अगर हम चाहते है कि हमारी संतति संस्कारवान बने!

Filed in: बेबाक कलम

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